18 March 2019

उपभोक्ता संरक्षण हेतु जागरूकता जरूरी


By Straightkhabar :19-02-2019 08:27


उपभोक्ता को वस्तु और सेवा के मूल्य, वस्तु की मात्रा, गुणवता, पैक की गई वस्तुओं की पैकिंग तिथि, खाद्य पदार्थ और औषधियों के संबंध में किस तिथि के पहले उपयोग किया जाना है इन सबके बारे में विस्तार से जानकारी देने के लिए सरकार को गैर-सरकारी संगठनों और शिक्षण संस्थाओं के सहयोग से विस्तार से जानकारी देकर जागरूक करने के लिए हर स्तर सघन अभियान की जरूरत है। इसके अतिरिक्त उपभोक्ताओं  को सरकार द्वारा उसके अधिकारों के संरक्षण हेतु गठित विभिन्न निकायों एवं मंचों, तथा  उपभोक्ता संरक्षण हेतु की जाने वाली कानून प्रक्रियाओं के बारे में भी शिक्षित किए जाने की जरूरत है। 

भारत में पुरातन काल से यह कहावत चली आ रही है कि संतोष ही सबसे बड़ा धन है, इसलिए भारतीय संस्कृति में आवश्यकताओं को सीमित रखने पर जोर दिया जाता रहा है, किंतु वर्तमान में भारत में भी पश्चिम की नकल करते हुए उपभोक्तावाद का दौर चल रहा है। वर्तमान बाजार अर्थव्यवस्था में बड़े संगठित उत्पादकों की उपभोक्तावाद को बढ़ावा देने में प्रमुख रही हैं। सिद्धान्त रूप में तो बा•ाार अर्थव्यवस्था में पूर्ण प्रतिस्पर्धा के अंतर्गत उपभोक्ताओं को उचित कीमत पर गुणवतापूर्ण उत्पाद वस्तुओं एवं सेवाएं मिलती है। किंतु व्यवहार में उत्पादकों द्वारा येन केन प्रकारेण से बाजार में अपने उत्पाद को खपाने के प्रयास के कारण उपभोक्ता को सही वस्तु व सेवा सही मूल्य पर नहीं मिल पाती है। बड़े-बड़े बहुराष्ट्रीय निगमों द्वारा अपने उत्पादों की खपत के लिए अरबों खरबों रुपये खर्च विज्ञापन और प्रचार प्रसार पर खर्च करके उपभोक्ताओं को उनके उत्पादों को  उपयोग एवं उपभोग करने हेतु प्रेरित करते रहते हैं जिनकी संभवत: आम उपभोक्ता को जरूरत नहीं होती है।  इस कारण घरेलू उपभोक्ताओं का वस्तुओं एवं और सेवाओं पर व्यय बढ़ता जा रहा है।

यदि संयुक्त राज्य अमेरिका को आधुनिक बाजार अर्थव्यवस्था तथा उपभोक्तावाद का जनक माना जाता है तो उपभोक्ता संरक्षण आन्दोलन की पहल करने का पूरा श्रेय भी संयुक्त राज्य अमेरिका के जागरूक नागरिकों को जाता  है। अमेरिका में राल नादर द्वारा प्रारंभ किए गए जोरदार उपभोक्ता आन्दोलन के फलस्वरूप 16 मार्च 1962 को  अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन कैनेडी ने ग्राहक संरक्षण बिल को मंजूरी दी।  इसीलिए 15 मार्च को अंतरराष्ट्रीय ग्राहक दिवस मनाया जाता है। भारत में यदि सूक्ष्मता से देखें तो  उपभोक्ता या ग्राहक के संरक्षण हेतु पहल टाटा के नेतृत्व में वर्ष 1966 में बम्बई के उद्यमियों ने स्वच्छ व्यापार व्यवहार संगठन की स्थापना की। 1974 में पुणे के बी.एम. जोशी ने उपभोक्ता संरक्षण हेतु  ग्राहक पंचायत नाम के एक गैर-सरकारी संगठन की स्थापना करके अन्य स्थानों पर भी उसकी शाखाएं स्थापित की।  इसके बाद भारत के अनेक स्थानों पर उपभोक्ता संरक्षण के सरकारी और गैर-सरकारी प्रयास होते रहे। भारत में 24 दिसंबर 1986 को संसद ने उपभोक्ता संरक्षण कानून को मंजूरी दी।

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 के तहत भारत की संविधान की धारा 14 से 19 के अंतर्गत दिए गए 6 अधिकारों से आरंभ होते हैं:- पहला,  सुरक्षा का अधिकार, जीवन एवं सम्पत्ति के लिए जोखिम वाली वस्तुओं एवं सेवाओं से सुरक्षा का अधिकार। दूसरा सूचना पाने का अधिकार,  इसके अंतर्गत उपभोक्ता को वस्तुओं की एवं सेवाओं की मात्रा, गुणवत्ता, शक्ति, शुद्धता, स्तर, और मूल्य के बारे में जानकारी पाने का अधिकार है।
तीसरा, चयन का अधिकार,  प्रतिस्पर्धी कीमत पर वस्तुओं और सेवाओं की किस्मों को चुनकर  आश्वस्त होने का अधिकार, इसका आशय यह हुआ कि सरकार निजी क्षेत्र के एकाधिकार के स्थान पर प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देगी। चौथा, सुने जाने का अधिकार,  उपभोक्ता की शिकायत और सलाह को विभिन्न सरकारी एवं गैर-सरकारी मंचों पर सुने जाने का अधिकार। पांचवा, विवाद सुलझाने का अधिकार, अनुचित व्यापार व्यवहारों द्वारा उपभोक्ताओं के शोषण पर उत्पन्न विवाद सुलझाने का अधिकार। छठा,  उपभोक्ता को जानकार बनाए रखने के लिए ज्ञान और कुशलता का अधिकार। 

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 के कार्यान्वयन के  बाद अनेक समस्याएं देखी गईं। अध्ययनोंं में  पाया गया कि  अधिनियम के अंतर्गत उपभोक्ता को प्राप्त अधिकारों के प्रचार के  बावजूद इसके बारे में अधिकांश उपभोक्ताओं का अज्ञानता से उपभोक्ता में जागरूकता नहीं आ सकी इस कारण वे संरक्षण से वंचित रहे।  जो भी उपभोक्ता के विवादों के मामलों में निपटान दर 90 प्रतिशत थी। लेकिन निपटान होने में लगभग 12 महीने लगते थे, इस प्रकार काफी समय लगता था। इसके अलावा अधिनियम में उपभोक्ता तथा निर्माता के बीच कान्टे्रक्ट का उल्लेख नहीं था, जिनकी शर्तें अनुचित या सब कुछ निर्माता के हित में होती थीं। इसीलिए विधि आयोग के सुझाव पर उपभोक्ता संरक्षण बिल 2018 को संसद में प्रस्तुत  किया।  इस विधेयक ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 का स्थान ले लिया है, यह उपभोक्ता के अधिकारों को मजबूत बनाता है और खराब वस्तुओं एवं सेवाओं में दोष से संबंधित शिकायतों के निवारण के लिए विभिन्न मंचों से विभिन्न स्तरों पर शिकायत निवारण की व्यवस्था करता है।

उपभोक्ता दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है- पहला व्यवसायी उपभोक्ता तथा दूसरा, घरेलू उपभोक्ता। भारत के लगभग सभी राज्यों में व्यवसायी  उपभोक्ता संगठित और शिक्षित है, इसलिए उसको उपभोक्ता संरक्षण कानून और उसके अंतर्गत प्राप्त उपभोक्ता को प्राप्त सभी अधिकारों के बारे में जानकारी होने से उसका वस्तु एवं सेवा की मात्रा, गुणवता और मूल्य के संबंध में वह जागरूक तथा सतर्क रहता है इसलिए संरक्षण अधिनियम में प्राप्त अधिकारों से अधिकांश मामलों में लाभान्वित होता रहता है। व्यवसायियों के विपरीत भारत के अधिकांश घरेलू उपभोक्ताओं को उपभोक्ता के अधिकारों के बारे में अज्ञानता की स्थिति है। उपभोक्ता संरक्षण निकायों के द्वारा प्रचार एवं जागृति शिविरों के आयोजन के बावजूद उनमें जागरूकता की कमी है। जब तक घरेलू उपभोक्ता खासकर ग्रामीण उपभोक्ता,  उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम द्वारा उसके संरक्षण हेतु दिए गए अधिकारों से अपरिचित एवं अनजान बना रहेगा उसका अनजाने में वह उत्पादक की मुनाफाखोरी, मिलावटखोरी तथा स्वास्थ्य की दृष्टि से घटिया वस्तुओं का उपभोग करके ठगाता रहेगा। 

उपभोक्ता को वस्तु और सेवा के मूल्य, वस्तु की मात्रा, गुणवता, पैक की गई वस्तुओं की पैकिंग तिथि, खाद्य पदार्थ और औषधियों के संबंध में किस तिथि के पहले उपयोग किया जाना है इन सबके बारे में विस्तार से जानकारी देने के लिए सरकार को गैर-सरकारी संगठनों और शिक्षण संस्थाओं के सहयोग से विस्तार से जानकारी देकर जागरूक करने के लिए हर स्तर सघन अभियान की जरूरत है। इसके अतिरिक्त उपभोक्ताओं  को सरकार द्वारा उसके अधिकारों के संरक्षण हेतु गठित विभिन्न निकायों एवं मंचों, तथा  उपभोक्ता संरक्षण हेतु की जाने वाली कानून प्रक्रियाओं के बारे में भी शिक्षित किए जाने की जरूरत है। सरकार द्वारा उपभोक्ता संरक्षण कानून में उपभोक्ता को दिए गए अधिकारों से शिक्षित एवं जागरूक करने के लिए सरकारी आयोगों एव निकायों को जागरूकता शिविरों के माध्यम से युवाओं को  गैर-सरकारी उपभोक्ता जागरूकता संगठनों के गठन के लिए भी प्रेरित किया जाना चाहिए।    
 

Source:Agency